आंबेडकरवाद ने कभी नहीं खोया अपना स्वरूप

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देश में लोकसभा के लिए पहले चुनावों की घोषणा अक्तूबर 1951 में हुई थी और इसके लिए मतदान 1952 में हुआ. इस दौर में डॉ आंबेडकर ने अनुसूचित जाति संघ के लिए घोषणापत्र लिखा था. वो इस राजनीतिक पार्टी का नेतृत्व करते थे. इस घोषणापत्र को एक नज़र देखने पर वो एक योजनाकर्ता के रूप में दिखते हैं जिन्होंने लिखा था कि ब्रितानी शासन ख़त्म होने के बाद के भारत को फिर नए सिरे से कैसे गढ़ा जाना चाहिए. घोषणापत्र में दलितों के लिए उच्च शिक्षा में व्यवस्था की बात की गई थी ताकि वो नागरिक और सैन्य सेवाओं में प्रवेश ले सकें. इसमें समाज के ऊंचे और निम्न वर्ग के बीच की खाई को पाटने की बात भी की गई थी. 19 पन्ने के इस दस्तावेज़ में दलितों, आदिवासियों और पिछड़ी जातियों के लिए मात्र एक ही पन्ना था. बाकी पन्नों में भारत को यूरोप और अमरीका की तर्ज पर औद्योगिक और आधुनिक बनाने की योजना थी. ये वो दौर था जब आधा विश्व कम्युनिस्ट झंडे के लाल रंग से रंगा था. कुछ साल पहले पड़ोसी चीन में कम्युनिस्ट क्रांति हुई थी और ऐसे में आंबेडकर ने घोषणापत्र में (1) खेती के आधुनिकीकरण (2) छोटे खेतों की जगह बड़े खेत बनाने (3) स्वस्थ्य बीजों की सप्लाई की बातें लिखी थीं. घोषणापत्र मतदाताओं को ये आश्वासन देता है कि उनकी पार्टी "औद्योगिक उत्पादन को लेकर किसी रुढ़ि या प्रक्रिया से बंधकर नहीं चलेगी." दूसरे शब्दों में, डॉक्टर आंबेडकर मार्क्सवाद और सामाजिक व्यवस्था को ख़ारिज करते हैं, लेकिन वे पूंजीवाद का भी समर्थन नहीं करते. हालांकि निजी क्षेत्र की भूमिका को लेकर भी कोई सैद्धांतिक विचार व्यक्त नहीं करते. घोषणापत्र में कहा गया है, "जब किसी उद्योग को सार्वजनिक उपक्रम बनाने की संभावना हो और वो ज़रूरी हो, तब अनुसूचित जाति संघ उसका समर्थन करेगा. वहीं जहां निजी क्षेत्र की संभावना हो और सार्वजनिक उपक्रम ज़रूरी न हो, वहां निजी उद्यम की अनुमति दी जाएगी."



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